अलमारी

जब मेरी आँख खुली तो दोपहर के तीन बजे थे| सब बिलकुल सूना था| किसी सुहावने सपने ने मुझे जगाया था| उसमें कुछ पुराने पल थे; तुम्हारी बेहद खूबसूरत आँखों के अलावा सब धुंदला था| वो जुल्फ जो तुम्हारे गाल पे बड़े गुरूर से इठला रही थी, बुला रही थी मुझे तुम्हारे और करीब|

सपने में कुछ लम्हे थे; थोड़े तुम्हारे साथ, थोड़े तुम्हारे बगैर| उन सब यादों से गुफ्तगू करने के लिए मैं अलमारी की तरफ गया जिसमे मैं कॉलेज से अपनी सभी करीबी चीजें रखता था| देखा तो उसमे एक मोरपंख था| काफी पुराना होगा पर अभी भी उसने बारिश की याद करा दी जब शाम को हमनें वो मोर देखा था; ठीक उस पेड़ के आगे जहाँ हम अक्सर मिला करते थे| वो ऐसा वैसा पंख नहीं था जो आजकल दुकानों में बिकता है; बारिश में नाचनेवाले असली मोर का पंख था| मैंने हलके से उसे गालों पे लगाया, तो तुम्हारे छूने का एहसास हुआ जब तुम मजे मजे में मेरे गाल ओढ़ा करती थी|

उस पंख के नीचे था एक ख़त जिसमें थी मेरी टूटी फूटी नज्म़ जो तुमने जाते वक़्त मुझको सौपी और कहाँ,

“अगर किसी लड़की को देखकर इससे अच्छा ख़याल आए तो उसके लिए जान दे देना और अगर ना आके भी किसी हसीना से दिल लगाया तो तुम्हे कच्चा खा जाऊँगी; चाहे जिधर भी हो| ”

बाकी सारे खत मैंने उसी वक़्त जलाए थे बस रह गई थी यह कविता जिसे मैं नहीं जला पाया|

उस चिट्ठी के पीछे था तुम्हारा सफ़ेद रुमाल जो मैंने कैन्टीन में से चूराया था जब तुम चाय लेने गई थी| आज भी उसमें से तेरे जिस्म की खुशबू आती है जो मुझे ले जाती है उसी समय में जहाँ हमनें कसमें खाई थी के कभी जुदा ना होंगे| बाकी कायनात का खेल था जो हम बिछड़ गए| उस दिन से लेके आज तक में खुद को यह एहसास दिलाता रहा “जो होता है अच्छे के लिए होता है|” और यकीन मानो; अच्छा हुआ भी| सब से अच्छी चीज यह हुई मैंने लोगों की परवाह करनी छोड़ दी और खुद के लिए जीता गया| जीने की वजह ढूँढने के अलावा खुद को वजह बनाकर लिखता गया; बस लिखता गया|

मुझे पता है काफ़ी लोग मेरे पीठ पीछे मुझे ‘देवदास’ कहकर हँसते होंगे पर मुझे कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता के कोई मेरे बारे में क्या सोचता है| अल्फ़ाज़ लिखना मेरा काम है; दिल तक पहुँचना अल्फाजों का| फिर भी शुक्रगुजार हूँ उन चंद वाचकों का जिन्होंने मेरे कलामों को बेईंतेहान मोहब्बत से नवाज़ा| यह मेरी खुशनसीबी है की मेरे ख़याल उनके जेहेन तक पहुँच पाए| अब मुझे तुम से कोई गीला नहीं और कभी तुम्हारा मन खानें लगे तो मायूस मत होना; तुम ने एक ‘शायर’ बनाया है| गुरूर रखना इस बात का| मुझे बस तलाश उस सुकून की थी जिसे में अपनी लिखावट से अर्जा पा रहा हूँ| तुम सिर्फ अपना ख़याल रखना और ख़ुश रहना| अगर कभी सुनोगी मेरी गज़ल किसी हारे हुए आशिक़ के मूँह से; तो बस हसकर कहना, “वाह..सुभानल्लाह !!” मुझ तक दाद पहुँच जाएगी|  

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