अलमारी
जब मेरी आँख खुली तो दोपहर के तीन बजे थे| सब बिलकुल सूना था| किसी सुहावने सपने ने मुझे जगाया था| उसमें कुछ पुराने पल थे; तुम्हारी बेहद खूबसूरत आँखों के अलावा सब धुंदला था| वो जुल्फ जो तुम्हारे गाल पे बड़े गुरूर से इठला रही थी, बुला रही थी मुझे तुम्हारे और करीब| सपने में कुछ लम्हे थे; थोड़े तुम्हारे साथ, थोड़े तुम्हारे बगैर| उन सब यादों से गुफ्तगू करने के लिए मैं अलमारी की तरफ गया जिसमे मैं कॉलेज से अपनी सभी करीबी चीजें रखता था| देखा तो उसमे एक मोरपंख था| काफी पुराना होगा पर अभी भी उसने बारिश की याद करा दी जब शाम को हमनें वो मोर देखा था; ठीक उस पेड़ के आगे जहाँ हम अक्सर मिला करते थे| वो ऐसा वैसा पंख नहीं था जो आजकल दुकानों में बिकता है; बारिश में नाचनेवाले असली मोर का पंख था| मैंने हलके से उसे गालों पे लगाया, तो तुम्हारे छूने का एहसास हुआ जब तुम मजे मजे में मेरे गाल ओढ़ा करती थी| उस पंख के नीचे था एक ख़त जिसमें थी मेरी टूटी फूटी नज्म़ जो तुमने जाते वक़्त मुझको सौपी और कहाँ, “अगर किसी लड़की को देखकर इससे अच्छा ख़याल आए तो उसके लिए जान दे देना और अगर ना आके भी किसी हसीना से दिल...